NCERT Solutions for Class 11 Biology Chapter 11 Transport in Plants in Hindi

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Access NCERT Solutions for Class XI Biology Chapter 11 – पौधों में परिवहन

1. विसरण की दर को कौन-से कारक प्रभावित करते हैं? 

उत्तर: विसरण की दर को प्रभावित करने वाले कारक निम्न हैं -

  • तापमान : तापमान के बढ़ने से विसरण की दर बढ़ती है। 

  • विसरण कर रहे पदार्थों का घनत्व : विसरण की दर विसरण कर रहे पदार्थों के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होती है। इसको ग्राहम के विसरण का नियम (Graham’ law of diffusion) कहते हैं। 

  • विसरण का माध्यम : अधिक सान्द्र माध्यम में विसरण की दर कम हो जाती है। 

  • विसरण दाब प्रवणता : विसरण दाब प्रवणता जितनी अधिक होती है अणुओं का विसरण उतना ही तीव्र होता है। 


2. पोरीन्स क्या हैं? विसरण में ये क्या भूमिका निभाते हैं? 

उत्तर: पोरीन्स प्रोटीन के वृहद अणु हैं जो माइटोकॉन्ड्रिया, क्लोरोप्लास्ट तथा कुछ जीवाणुओं की बाह्य कला में धंसे रहते हैं। ये बड़े छिद्र बनाते हैं जिससे बड़े अणु उसमें से निकल सकें। अत: ये सहज विसरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 


3. पादपों में सक्रिय परिवहन के दौरान प्रोटीन पंप के द्वारा क्या भूमिका निभाई जाती है? व्याख्या कीजिए। 

उत्तर: पादप कला के लिपिड स्तर में वाहक प्रोटीन के अणु मिलते हैं। ये ऊर्जा का उपयोग कर सान्द्रता विभव के विरुद्ध अणुओं को भेजते हैं। अतः: उन्हें प्रोटीन पंप कहते हैं। ये आयन का परिवहन कला के आर-पार इन प्रोटीन पंपों की सहायता से करते हैं। 


4. शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव क्यों होता है? वर्णन कीजिए। 

उत्तर: शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है; क्योंकि 

  • जल अणुओं में गतिज ऊर्जा पाई जाती है। यह तरल और गैस दोनों अवस्था में गति करते हुए पाए जाते हैं। गति स्थिर तथा तीव्र (constant and rapid) दोनों प्रकार की हो सकती है। 

  • किसी माध्यम में यदि अधिक मात्रा में जल हो तो उसकी गतिज ऊर्जा तथा जल विभव अधिक होगा। शुद्ध जल में सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है। 

  • जब दो जल तन्त्र परस्पर सम्पर्क में हों तो पानी के अणु उच्च जल विभव (या तनु घोल) वाले तंत्र से कम जल विभव (सान्द्र घोल) वाले तंत्र की ओर जाते हैं। 

  • जल विभव को ग्रीक चिन्ह Ψ (Psi) से चिह्नित करते हैं। इसे पास्कल (pascal) दाब इकाई में व्यक्त किया जाता है। 

  • मानक परिस्थितियों में शुद्ध जल का विभव (water potential) शून्य होता है। 

  • किसी विलयन तंत्र का जल विभव उस विलयन से जल बाहर निकलने की प्रवृत्ति का मापन करता है। यह प्रवृत्ति ताप एवं दाब के साथ बढ़ती जाती है, लेकिन विलेय (solute) की उपस्थिति के कारण घटती है। 

  • शुद्ध जल में विलेय को घोलने पर घोल में जल की सान्द्रता और जल विभव कम होता जाता है। अतः सभी विलयनों में शुद्ध जल की अपेक्षा जल विभव कम होता है। जल विभव के कम होने का कारण विलेय विभव (solute potential Ψs ) होता है। इसे परासरण विभव (osmotic potential) भी कहते हैं। जल विभव तथा विलेय विभव ऋणात्मक होता है। कोशिका द्वारा जल अवशोषित करने के फलस्वरूप कोशिका भित्ति पर दबाव पड़ता है, जिससे यह आशून (स्फीत) हो जाती है। इसे दाब विभव (Pressure potential) कहते हैं। दाब विभव प्रायः सकारात्मक होता है, लेकिन जाइलम के जल स्तम्भ में ऋणात्मक दाब विभव रसारोहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

  • किसी पादप कोशिका में जलीय विभव (Ψ) तीन बलों द्वारा नियंत्रित होता है-दाब विभव (Ψp) परासरणीय विभव या विलेय विभव (Ψs ) तथा मैट्रिक्स विभव (Ψn)। मैट्रिक्स विभव प्रायः नगण्य होता है। अतः कोशिका के जलीय विभव की गणना निम्नलिखित सूत्रानुसार करते हैं Ψ = Ψp + Ψs 9 जीवद्रव्यकुंचित कोशिका का जलीय विभव परासरणीय विभव के बराबर होता है; क्योंकि दाब विभव शून्य होता है। पूर्ण स्फीति कोशिका में दाब विभव और परासरणीय विभव के बराबर हो जाने से जलीय विभव शून्य हो जाता है। 

  • जल विभव सान्द्रता (concentration), प्रवणता (gravity) और दाब (pressure) से प्रभावित होता हैं। 


5. निम्नलिखित के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए- 

(क) विसरण एवं परासरण 

उत्तर: 

परासरण और विसरण में अंतर –

परासरण (Osmosis)

विसरण (Diffusion)

परासरण की क्रिया के लिए अर्द्ध पारगम्य झिल्ली आवश्यक है।

इसमें अर्द्ध पारगम्य झिल्ली की आवश्यकता नहीं है।

यह केवल तरल विलायक के अणुओं द्वारा संपन्न होती है।

विसरण की क्रिया ठोस, गैस एवं द्रव सभी के लिए लागू होती है।

इस क्रिया में विलायक के अणुओं का स्थानांतरण होता है।

इस क्रिया में विलेय और विलायक दोनों के अणुओं का स्थानांतरण होता है।

यह क्रिया विलेय के विभव पर आश्रित है।

यह क्रिया विलेय के विभव पर आश्रित नहीं है।

इस क्रिया की गति धीमी होती है।

इस क्रिया की गति तीव्र होती है।


(ख) वाष्पोत्सर्जन एवं वाष्पीकरण 

उत्तर: 

वाष्पोत्सर्जन एवं वाष्पीकरण में अंतर –

वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)

वाष्पीकरण (Evaporation)

वाष्पोत्सर्जन एक जैविक क्रिया है।

वाष्पीकरण एक भौतिक क्रिया है।

वाष्पोत्सर्जन केवल सजीव पौधों में होता है।

यह सजीव एवं निर्जीव दोनों में ही होती है।

पानी पौधों के वायवीय भागों में विशेष कर पत्तियों की सतह से वाष्प के रूप में बाहर निकलता है।

पानी पौधे की किसी भी सतह से वाष्प के रूप में बाहर निकलता है।

वाष्पोत्सर्जन क्रिया रक्षक-कोशिकाओं द्वारा नियंत्रित रहती है।

वाष्पीकरण क्रिया रक्षक-कोशिकाओं द्वारा नहीं होती है।

इसमें हानि हुए पानी की पूर्ति अवशोषण द्वारा की जा सकती है।

वाष्पीकरण क्रिया में यह संभव  नहीं है।


(ग) परासारी दाब तथा परासारी विभव 

उत्तर: 

परासरी दाब एवं परासरी विभव में अंतर –

परासरी दाब (Osmotic pressure):

परासरी विभव (Osmotic potential):

जब दो अलग-अलग सांद्रता वाले विलयनों को अर्द्ध पारगम्य झिल्ली द्वारा अलग किया जाता है तब उस विलयन में घुलनशील विलेय के कारण एक दाब उत्पन्न होता है। जिसे परासरण दाब कहते हैं।

परासरण विभव पानी की उस मात्रा के बराबर होता है जो कि विलेय के दबाव को कम कर सके। 

परासरण दाब एक धनात्मक दाब है।

परासरी विभव का मान ऋणात्मक होता है।


(घ) विसरण तथा अंतः शोषण

उत्तर: 

विसरण एवं अंतः शोषण:

प्रसार

असमस

यह निष्क्रिय परिवहन है जिसमें पदार्थ की गति उच्च सांद्रता वाले क्षेत्र से निम्न सांद्रता की ओर होती है।

परासरण एक विशेष प्रकार का विसरण है जिसमें पदार्थ एक अर्ध पारगम्य झिल्ली द्वारा अलग हो जाते हैं

किसी भी माध्यम में होता है

केवल तरल माध्यम में होता है

अर्ध-पारगम्य झिल्ली की आवश्यकता नहीं है

अर्ध-पारगम्य झिल्ली की आवश्यकता

टर्गर दबाव की कोई भूमिका नहीं


यह प्रणाली के दबाव दबाव द्वारा प्रतिरोध का सामना करता है


(च) पादपों में पानी के अवशोषण का एपोप्लास्ट और सिम्प्लास्ट पथ |

उत्तर: 

पौधों में पानी की गति के एपोप्लास्ट और सिम्प्लास्ट मार्ग:

अपोप्लास्ट

सिम्प्लास्ट

शरीर के निर्जीव भागों जैसे कोशिका भित्ति और अंतर कोशिकीय स्थान का मिश्रण होते हैं।

इसमें पौधे के शरीर के जीवित भाग होते हैं।

तुलनात्मक रूप से तेज  |

यह धीमा है |

पानी की गति में थोड़ा प्रतिरोध दिया गया है |

सिम्प्लास्ट के माध्यम से पानी की गति में कुछ प्रतिरोध होता है |

जड़ों की उपापचयी अवस्था का एपोप्लास्ट मार्ग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है |

जड़ों की उपापचयी अवस्था का सिम्प्लास्ट मार्ग पर सीधा प्रभाव पड़ता है |


(छ) बिन्दु स्राव एवं परिवहन (अभिगमन)। 

उत्तर: 

बिंदु स्त्राव एवं परिवहन:

गुट्टेशन

स्वेद

पौधे से तरल बूंदों की हानि

यह वाष्प के रूप में पौधे में पानी की कमी है।

पानी के छिद्रों के माध्यम से होता है

मसूर, रंध्र और एपिडर्मल कोशिकाओं के माध्यम से होता है।

गटेशन के दौरान पानी के रोम छिद्र हमेशा खुले रहते हैं।

वाष्पोत्सर्जन के दौरान रंध्र बंद या खुले हो सकते हैं

आर्द्र अवधि के दौरान होता है।

शुष्क अवधि के दौरान होता है।


6. जल विभव का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। कौन-से कारक इसे प्रभावित करते हैं? जल विभव, विलेय विभव तथा दाब विभव के आपसी संबंधों की व्याख्या कीजिए। 

उत्तर: शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है; क्योंकि 

  • जल अणुओं में गतिज ऊर्जा पाई जाती है। यह तरल और गैस दोनों अवस्था में गति करते हुए पाए जाते हैं। गति स्थिर तथा तीव्र (constant and rapid) दोनों प्रकार की हो सकती है। 

  • किसी माध्यम में यदि अधिक मात्रा में जल हो तो उसकी गतिज ऊर्जा तथा जल विभव अधिक होगा। शुद्ध जल में सबसे अधिक जल विभव (water potential) होता है। 

  • जब दो जल तन्त्र परस्पर सम्पर्क में हों तो पानी के अणु उच्च जल विभव (या तनु घोल) वाले तंत्र से कम जल विभव (सान्द्र घोल) वाले तन्त्र की ओर जाते हैं। 

  • जल विभव को ग्रीक चिन्ह Ψ (Psi) से चिह्नित करते हैं। इसे पास्कल (pascal) दाब इकाई में व्यक्त किया जाता है। 

  • मानक परिस्थितियों में शुद्ध जल का विभव (water potential) शून्य होता है। 

  • किसी विलयन तंत्र का जल विभव उस विलयन से जल बाहर निकलने की प्रवृत्ति का मापन करता है। यह प्रवृत्ति ताप एवं दाब के साथ बढ़ती जाती है, लेकिन विलेय (solute) की उपस्थिति के कारण घटती है। 

  • शुद्ध जल में विलेय को घोलने पर घोल में जल की सान्द्रता और जल विभव कम होता जाता है। अतः सभी विलयनों में शुद्ध जल की अपेक्षा जल विभव कम होता है। जल विभव के कम होने का कारण विलेय विभव (solute potential Ψs ) होता है। इसे परासरण विभव (osmotic potential) भी कहते हैं। जल विभव तथा विलेय विभव ऋणात्मक होता है। कोशिका द्वारा जल अवशोषित करने के फलस्वरूप कोशिका भित्ति पर दबाव पड़ता है, जिससे यह आशून (स्फीत) हो जाती है। इसे दाब विभव (Pressure potential) कहते हैं। दाब विभव प्रायः सकारात्मक होता है, लेकिन जाइलम के जल स्तम्भ में ऋणात्मक दाब विभव रसारोहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

  • किसी पादप कोशिका में जलीय विभव (Ψ) तीन बलों द्वारा नियंत्रित होता है-दाब विभव (Ψp) परासरणीय विभव या विलेय विभव (Ψs ) तथा मैट्रिक्स विभव (Ψn)। मैट्रिक्स विभव प्रायः नगण्य होता है। अतः कोशिका के जलीय विभव की गणना निम्नलिखित सूत्रानुसार करते हैं Ψ = Ψp + Ψs 9.जीवद्रव्यकुंचित कोशिका का जलीय विभव परासरणीय विभव के बराबर होता है; क्योंकि दाब विभव शून्य होता है। पूर्ण स्फीति कोशिका में दाब विभव और परासरणीय विभव के बराबर हो जाने से जलीय विभव शून्य हो जाता है। 

  • जल विभव सान्द्रता (concentration), प्रवणता (gravity) और दाब (pressure) से प्रभावित होता हैं। 


7. लब क्या होता है जब शुद्ध जल या विलयन पर पर्यावरण के दाब की अपेक्षा अधिक दाब लागू किया जाता है? 

उत्तर: जब शुद्ध जल या विलयन पर पर्यावरण के दाब की अपेक्षा अधिक दाब लागू किया जाता है। तो इसका जल विभव बढ़ जाता है। जब पौधों या कोशिका में जल विसरण द्वारा प्रवेश करता है तो कोशिका आशून (turgid) हो जाती है। इसके फलस्वरूप दाब विभव (pressure potential) बढ़ जाता है। दाब विभव अधिकतम सकारात्मक होता है। इसे 9 से प्रदर्शित करते हैं। जल विभव घुलित तथा दाब विभव से प्रभावित होता है। 


8. (क) रेखांकित चित्र की सहायता से पौधों में जीवद्रव्यकुंचन की विधि का वर्णन उदाहरण देकर कीजिए। 

उत्तर: (क) रिक्तिका मे पादप कोशिका को अतिपरासारी विलयन (hypertonic solution) में रख देने पर कोशिकारस कोशिका से बाहर आने लगता है। यह क्रिया बहिः परासरण (exosmosis) के कारण होती है। इसके फलस्वरूप जीवद्रव्य सिकुड़कर कोशिका में एक ओर एकत्र हो जाता है। इस अवस्था में कोशिका पूर्ण श्लथ (fully flaccid) हो जाती है। इस क्रिया को जीवद्रव्यकुंचन (plasmolysis) कहते हैं। जीवद्रव्यकुंचित कोशिका की कोशिका भित्ति और जीवद्रव्य के मध्य अतिपरासारी विलयन एकत्र हो जाता है, लेकिन यह विलयन कोशिका रिक्तिका में नहीं पहुँचता। इससे यह स्पष्ट होता है कि कोशिका भित्ति पारगम्य होती है और रिक्तिका कला अर्द्धपारगम्य होती है। 


 पादप कोशिका का जीवद्रव्यकुंचन:


Type of Solution


जीवद्रव्यकुंचित कोशिका को आसुत जल या अल्पपरासारी विलयन (hypotonic solution) में रखा जाए तो कोशिका पुनः अपनी पूर्व स्थिति में आ जाती है। इस प्रक्रिया को जीवद्रव्यकुंचन (deplasmolysis) कहते हैं। कोशिका को समपरासरी विलयन (isotonic solution) में रखने पर कोशिका में कोई परिवर्तन नहीं होता, जितने जल अणु कोशिका से बाहर निकलते हैं उतने जल अणु कोशिका में प्रवेश कर जाते हैं। 


(ख) यदि पौधे की कोशिका को उच्च जल विभव वाले विलयन में रखा जाए तो क्या होगा? 

उत्तर: अल्पसारी विलयन (hypotonic solution) कोशिकारस या कोशिका द्रव्य की अपेक्षा तनु (dilute) होता है। इसका जल विभव (water potential) अधिक होता है। अतः पादप कोशिका को अल्पपरासारी विलयन में रखने पर अन्त:परासरण की क्रिया होती है। इस क्रिया के फलस्वरूप अतिरिक्त जल कोशिका में पहुँच कर स्फीति दाब (turgor pressure) उत्पन्न करता है। स्फीति दाब भित्ति दाब (wall pressure) के बराबर होता है। स्फीति दाब को दाब विभव (pressure potential) भी कहते हैं। कोशिका भित्ति की दृढ़ता एवं स्फीति दाब के कारण कोशिका भित्ति क्षतिग्रस्त नहीं होती। स्फीति या आशूनता के कारण कोशिका में वृद्धि होती है। स्फीति दाब एवं परासरण दाब के बराबर हो जाने पर कोशिका में जल का आना रुक जाता है। 


9. पादप में जल एवं खनिज के अवशोषण में माइकोराइजल (कवकमूल सहजीवन) संबंध कितने सहायक हैं? 

उत्तर: माइकोराइजल या कवकमूल सहजीवन अनेक उच्च पादपों की जड़े कवक मूल द्वारा संक्रमित हो जाती हैं; जैसे–चीड़, देवदार, ओक आदि। कवक तन्तु की जड़ों की सतह पर बाह्य पादप कवक मूल (ectophytic mycorrhiza) बनाता है। कभी-कभी कवक तन्तु जड़ के अन्दर पहुँच जाते हैं और अंत:पादप कवकमूल बनाते हैं। कवक मूल संगठन में कवक तन्तु अपना भोजन पोषक (host) की जड़ों से प्राप्त करते हैं तथा वातावरण की नमी व भूमि की ऊपरी सतह से लवणों का अवशोषण कर पोषक पौधे को प्रदान करने का कार्य करते हैं। कुछ आवृतबीजी पौधे; जैसे-निओशिया (Neottia), मोनोटरोपा (Monotropa) भी कवकमूल सहजीवन प्रदर्शित करते हैं। इन पौधों को अगर कवक सहजीविता समय पर उपलब्ध नहीं होती तो ये मर जाते हैं। चीड़ के बीज कवक सहजीविता स्थापित न होने की स्थिति में अंकुरित होकर नवोद्भिद (seedings) नहीं बना पाते। 


10. पादप में जल परिवहन हेतु मूल दाब क्या भूमिका निभाता है? 

उत्तर:  मूलदाब - मूल वल्कुट (root cortex) की कोशिकाओं की स्फीति (आशून) स्थिति में अपने कोशिका द्रव्य पर पड़ने वाले दाब को मूलदाब (root pressure) कहते हैं। मूलदाब के फलस्वरूप जल (कोशिकारस) जाइलम वाहिकाओं में प्रवेश करके तने में कुछ ऊंचाई तक ऊपर चढ़ता है। मूलदाब शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम स्टीफन हेल्स (Stephan Hales, 1927) ने किया। स्टॉकिंग (Stocking, 1956) के अनुसार जड़ के जाइलम में उत्पन्न दाब, जो जड़ की उपापचयी क्रियाओं से उत्पन्न होता है, मूलदाब कहलाता है। मूलदाब सामान्यतः + 1 से + 2 बार तक होता है। इससे जल कुछ ऊंचाई तक चढ़ सकता है। शुष्क मृदा में मूल दाब उत्पन्न नहीं होता। बहुत-से पौधों; जैसे–अनावृतबीजी (gymnosperms) में मूल दाब उत्पन्न ही नहीं होता। अतः आधुनिक मतानुसार रसारोहण में मूलदाब का विशेष कार्य नहीं है। 


11. पादपों में जल परिवहन हेतु वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल की व्याख्या कीजिए। वाष्पोत्सर्जन क्रिया को कौन-सा कारक प्रभावित करता है? पादपों के लिए कौन उपयोगी है? 

उत्तर: रसारोहण या जल परिवहन - पौधे जड़ों द्वारा जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं। अवशोषित जल गुरुत्वाकर्षण के विपरीत पर्याप्त ऊँचाई तक (पत्तियों तक) पहुंचता है। यह ऊँचाई सिकोया (Sequoia) में 370 फुट तक होती है। गुरुत्वाकर्षण के विपरीत जल के ऊपर चढ़ने की क्रिया को रसारोहण कहते हैं। सर्वमान्य वाष्पोत्सर्जन आकर्षण जलीय ससंजक मत (Transpiration Pull Cohesive Force of Water Theory) के अनुसार रसारोहण निम्नलिखित कारणों से होता है - 

  • वाष्पोत्सर्जन आकर्षण (वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल) : पत्तियों की कोशिकाओं से जल के वाष्पन के फलस्वरूप कोशिकाओं की परासरण सान्द्रता तथा विसरण दाब न्यूनता (Diffusion pressure deficit) अधिक हो जाती है। इसके फलस्वरूप जल जाइलम से परासरण द्वारा पर्ण कोशिकाओं में पहुँचता रहता है। जलवाष्प रंध्रों से वातावरण में विसरित होती रहती है। इसके फलस्वरूप जाइलम में उपस्थित जल स्तम्भ पर एक तनाव उत्पन्न हो जाता है। वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न होने वाले इस तनाव को वाष्पोत्सर्जन आकर्षण (transpiration pull) कहते हैं। 

  • जल अणुओं का ससंजक बल (Cohesive Force of water Molecules) : जल अणुओं के मध्य ससंजक बल (cohesive force) होता है। इसी ससंजक बल के कारण जल स्तम्भ 400 वायुमंडलीय दाब पर भी खंडित नहीं होता और इसकी निरंतरता बनी रहती है। ससंजक बल के कारण जल 1500 मीटर ऊंचाई तक चढ़ सकता है। 

  • जल तथा जाइलम भित्ति के मध्य आसंजन (Adhesion between Water and Cell wall of Xylem Tissue) : जाइलम ऊतक की कोशिकाओं और जल अणुओं के मध्य आसंजन (adhesion) का आकर्षण होता है। यह आसंजन जल स्तम्भ को सहारा प्रदान करता है। वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न तनाव जल स्तम्भ को ऊपर खींचता है।


Leaf Segment


जल एवं आयन अवशोषण एवं जड़ों में चालक के सिंप्लास्टिक एवं एपोप्लास्ट पथ 

वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक पौधों में वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारकों को दो समूहों में बांट सकते हैं 

(अ) बाह्य कारक (External Factors) 

(ब) आन्तरिक कारक (Internal Factors) 

(अ) बाह्य कारक 

  • वायुमंडल की आपेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity of Atmosphere) : वायुमंडल की आपेक्षिक आर्द्रता कम होने पर वाष्पोत्सर्जन अधिक होता है। आपेक्षिक आर्द्रता अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है। 

  • प्रकाश (Light) : प्रकाश के कारण रुधिर खुलते हैं, तापमान में वृद्धि होती है; अत: वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। रात्रि में रंध्र बन्द हो जाने से वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है। 

  • वायु (Wind) : वायु की गति अधिक होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर अधिक हो जाती है। 

  • तापक्रम (Temperature) : ताप के बढ़ने से आपेक्षिक आर्द्रता कम हो जाती है और वाष्पोत्सर्जन की दर बढ़ जाती है। ताप कम होने पर आपेक्षिक आर्द्रता अधिक हो जाती हैं और वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है। 

  • उपलब्ध जल (Available Water) : वाष्पोत्सर्जन की दर जल की उपलब्धता पर निर्भर करती है। मृदा में जल की कमी होने पर वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है। 


(ब) आन्तरिक कारक -  पत्तियों की संरचना, रंध्रों की संख्या एवं संरचना आदि वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करती है।

       वाष्पोत्सर्जन की उपयोगिता -  

  • पौधों में अवशोषण एवं परिवहन के लिए वाष्पोत्सर्जन खिंचाव उत्पन्न करता है। 

  • मृदा से प्राप्त खनिजों के पौधों के सभी अंगों (भागों) तक परिवहन में सहायता करता है। 

  • पत्ती की सतह को वाष्पीकरण द्वारा 10-15°C तक ठंडा रखता है। 

  • कोशिकाओं को स्फीति रखते हुए पादपों के आकार एवं बनावट को नियंत्रित रखने में सहायता करता है। 


12. पादपों में जाइलम रसारोहण के लिए जिम्मेदार कारकों की व्याख्या कीजिए। 

उत्तर: रसारोहण गुरुत्वाकर्षण के विपरीत मूलरोम से पत्तियों तक कोशिकारस (cell sap) के ऊपर चढ़ने की क्रिया को रसारोहण (Ascent of sap) कहते हैं। रसारोहण मुख्य रूप से वाष्पोत्सर्जन आकर्षण (transpiration pull) के कारण होता है। यह निम्नलिखित कारकों से प्रभावित होता है -

(i) संसंजन (Cohesion) : जल के अणुओं के मध्य आकर्षण। 

(ii) आसंजन (Adhesion) : जल अणुओं का ध्रुवीय सतह (जैसे-जाइलम ऊतक) से आकर्षण। 

(iii) पृष्ठ तनाव (Surface Tension) : जल अणुओं की द्रव अवस्था में गैसीय अवस्था। जल की उपर्युक्त विशिष्टताएँ जल को उच्च तन्य सामर्थ्य (high tensile strength) प्रदान करती हैं। वाहिकाओं एवं वाहिनिकाएँ (tracheids & vessels) कोशिका (capillary) के समान लघु व्यास वाली कोशिकाएँ होती हैं। 


13. पादपों में खनिजों के अवशोषण के दौरान अन्तः त्वचा की आवश्यक भूमिका क्या होती है? 

उत्तर: जड़ों की अंतस्त्वचा कोशिकाओं की कोशिका कला पर अनेक वाहक प्रोटीन्स पाई जाती हैं। ये प्रोटीन्स जड़ों द्वारा अवशोषित किए जाने वाले घुलितों की मात्रा और प्रकार को नियंत्रित करने वाले बिन्दुओं की भाँति कार्य करती हैं। अंतस्त्वचा की सुबेरिन मे (suberised) कैस्पेरी पट्टियों (casparian strips) द्वारा खनिज या घुलित पदार्थों के आयन्स या अणुओं का परिवहन एक ही दिशा (unidirectional) में होता है। अतः अंतस्त्वचा (endodermis) खनिजों की मात्रा) और प्रकार (quantity & type) को जाइलम तक पहुँचने को नियंत्रित करती है। जल तथा खनिजों की गति मूल त्वचा (epiblema) से अंतस्त्वचा तक सिम प्लास्टिक (symplastic) होती है। 


14. जाइलम परिवहन एकदिशीय तथा फ्लोएम परिवहन द्विदिशीय होता है। व्याख्या कीजिए। 

उत्तर: 

  • जाइलम परिवहन (Xylem Transport) : पौधे अपने लिए आवश्यक जल एवं खनिज पोषक मृदा से प्राप्त करते हैं। ये सक्रिय या निष्क्रिय अवशोषण या सम्मिश्रित प्रक्रिया द्वारा अवशोषित । होकर जाइलम तक पहुँचते हैं। जाइलम द्वारा जल एवं पोषक तत्वों का परिवहन एकदिशीय (unidirectional) होता है। ये पौधों के वृद्धि क्षेत्र की ओर विसरण द्वारा पहुंचते हैं। 

  • फ्लोएम परिवहन (Phloem Transport) : फ्लोएम द्वारा सामान्यतः कार्बनिक भोज्य पदार्थों का परिवहन होता है। कार्बनिक पदार्थों का संश्लेषण पत्तियों द्वारा होता है। पत्तियों में निर्मित भोज्य पदार्थों का पौधे के संचय अंगों (कुण्ड-सिक) तक परिवहन होता है। लेकिन यह स्रोत (पत्तियाँ) और कुण्ड (संचय अंग) अपनी भूमिका मौसम और आवश्यकतानुसार बदलते रहते हैं; जैसे-जड़ों में संचित अघुलनशील भोज्य पदार्थ बसन्त ऋतु के प्रारम्भ में घुलनशील शर्करा में बदलकर वर्दी और पुष्प कलिकाओं तक पहुँचने लगता है। इससे स्पष्ट है कि संश्लेषण स्रोत और संचय स्थल (कुण्ड-सिंक) का सम्बन्ध बदलता रहता है। अतः फ्लोएम में घुलनशील शर्करा का परिवहन द्विदिशीय या बहुउद्देशीय (bidirectional or multidirectional) होता है।


15. पादपों में शर्करा के स्थानान्तरण के दाब प्रवाह परिकल्पना की व्याख्या कीजिए। 

उत्तर: शर्करा के स्थानान्तरण की दाब प्रवाह परिकल्पना खाद्य पदार्थों (शर्करा) के वितरण की सर्वमान्य क्रियाविधि दाब प्रवाह परिकल्पना है। पत्तियों में संश्लेषित ग्लूकोज, सुक्रोज (sucrose) में बदलकर फ्लोएम की चालनी नलिकाओं और सहचर कोशिकाओं द्वारा पौधों के संचय अंगों में स्थानांतरित होता है। पत्तियों में निरंतर भोजन निर्माण होता रहता है। फ्लोएम ऊतक की चालनी नलिकाओं में जीवद्रव्य के प्रवाहित होते रहने के कारण उसमें घुलित भोज्य पदार्थों के अणु भी प्रवाहित होते रहते हैं। यह स्थानान्तरण अधिक सान्द्रता वाले स्थान से कम सान्द्रता वाले स्थानों की ओर होता है। पत्तियों की कोशिकाओं में निरंतर भोज्य पदार्थों का निर्माण होता रहता है, इसलिए पत्ती की कोशिकाओं में परासरण दाब अधिक रहता है। जड़ों तथा अन्य संचय भागों में भोज्य पदार्थों के अघुलनशील पदार्थों में बदल जाने या प्रयोग कर लिए जाने के कारण इन कोशिकाओं का परासरण दाब कम बना रहता है। भोज्य पदार्थों के परिवहन हेतु जल जाइलम ऊतक से प्राप्त होता है। संचय अंगों में मुक्त जल जाइलम ऊतक में वापस पहुँच जाता है। इस प्रकार फ्लोएम द्वारा सुगमतापूर्वक कार्बनिक भोज्य पदार्थों का संवहन होता रहता है। 


स्थानांतरण की प्रक्रिया की आरेखीय प्रस्तुति:


Transfer of sugar in plants


16. वाष्पोत्सर्जन के दौरान रक्षके द्वार कोशिका खुलने एवं बंद होने के क्या कारण हैं? 

उत्तर: वाष्पोत्सर्जन - पौधों के वायवीय भागों से होने वाले जल हानि को वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कहते हैं। यह सामान्यतया रंध्र (stomata) द्वारा होता है। उपचर्म (cuticle) तथा वातरंध्र (lenticel) इसमें सहायक होते हैं। रन्ध्र रक्षक द्वार कोशिकाओं (guard cells) से घिरा सूक्ष्म छिद्र होता है। रक्षक द्वार कोशिकाएँ सेम के बीज या वृक्क के आकार की होती हैं। ये चारों ओर से बाह्य त्वचीय कोशिकाओं अथवा सहायक कोशिकाओं से घिरी रहती हैं। रक्षक द्वार कोशिका में केन्द्रक तथा हरित लवक (chloroplast) पाए जाते हैं। रक्षक द्वार कोशिका की भीतरी सतह मोटी भित्ति वाली तथा बाह्य सतह पतली भित्ति वाली होती है। 


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रन्ध्र को खुलना या बन्द होना रक्षक द्वार कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) पर निर्भर करता है। जब रक्षक कोशिकाएँ स्फीति होती हैं तो रन्ध्र खुला रहता है और जब ये श्लथ (flaccid) होती हैं तो रंध्र बन्द हो जाते हैं। रंध्र के खुलने में रक्षक कोशिका की भित्तियों में उपस्थित माइक्रोफाइब्रिल्स सहायता करते हैं। ये अरीय क्रम में व्यवस्थित रहते हैं। सामान्यतः रन्ध्र दिन के समय खुले रहते हैं। औ रात्रि के समय बंद हो जाते हैं।


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