Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Questions and Answers FREE PDF
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Class 9 Ganga Chapter 9 Question Answer – राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
प्रश्न 1. “पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है?
(क) आदर और सम्मान
(ख) भक्ति और श्रद्धा
(ग) भय और शिष्टाचार
(घ) प्रेम और सहिष्णुता
उत्तर: (ग) भय और शिष्टाचार
क्यों: सभा में उपस्थित सभी राजा परशुराम के क्रोधी स्वभाव और पराक्रम से परिचित थे। इसलिए वे उनसे भयभीत थे। उन्होंने भय और शिष्टाचार के कारण अपने पिता तथा अपना नाम बताते हुए परशुराम को दंडवत प्रणाम किया।
प्रश्न 2. “जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?
(क) संवेदनशीलता
(ख) शिष्टता
(ग) सहनशीलता
(घ) उदासीनता
उत्तर: (ख) शिष्टता
क्यों: राजा जनक ने अतिथि के रूप में आए परशुराम का सम्मानपूर्वक अभिवादन किया और सीता को बुलाकर उनसे प्रणाम भी करवाया। उनका यह व्यवहार भारतीय संस्कृति के अतिथि-सत्कार और शिष्टाचार को दर्शाता है।
प्रश्न 3. “अति रिस बोले बचन कठोरा।” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था-
(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना
(ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना
(ग) शिव धनुष का खंडित होना
(घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति
उत्तर: (ग) शिव धनुष का खंडित होना
क्यों: परशुराम भगवान शिव को अपना गुरु मानते थे और उनके धनुष से विशेष लगाव रखते थे। शिव-धनुष को टूटा हुआ देखकर उन्हें लगा कि उनके गुरु का अपमान हुआ है। यही उनके अत्यधिक क्रोधित होने का मुख्य कारण था।
प्रश्न 4. राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
(क) कूटनीति और चतुराई
(ख) विनम्रता और मर्यादा
(ग) त्याग और समर्पण
(घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास
उत्तर: (ख) विनम्रता और मर्यादा
क्यों: श्रीराम परशुराम के कठोर और क्रोधपूर्ण वचनों का उत्तर अत्यंत शांत तथा विनम्र भाषा में देते हैं। वे स्वयं को उनका सेवक बताते हुए उनके क्रोध को शांत करने का प्रयास करते हैं। इससे उनकी विनम्रता और मर्यादित स्वभाव प्रकट होता है।
प्रश्न 5. “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।” लक्ष्मण के मुस्कराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?
(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।
(ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।
(ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।
(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
उत्तर: (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
क्यों: लक्ष्मण परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ नहीं थे और न ही वे अपनी श्रेष्ठता दिखाना चाहते थे। उन्हें परशुराम की धमकी और अहंकारपूर्ण वाणी अनुचित लगी। इसलिए उन्होंने व्यंग्यपूर्ण शब्दों के माध्यम से उन्हें चुनौती दी और उनके क्रोध तथा अहंकार का उत्तर दिया।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
प्रश्न 1. “अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?
उत्तर: यह पंक्ति सीता की व्याकुल मनःस्थिति के संदर्भ में कही गई है। श्रीराम द्वारा शिव-धनुष तोड़े जाने पर सीता अत्यंत प्रसन्न थीं, परंतु परशुराम ने धनुष तोड़ने वाले को दंड देने की चेतावनी दे दी। सीता परशुराम के क्रोधी और हठी स्वभाव से परिचित थीं। इसलिए वे राम की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गईं। चिंता और भय के कारण उन्हें आधा पल भी एक कल्प के समान लंबा लगने लगा।
प्रश्न 2. “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज- समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर: परशुराम ने चेतावनी दी कि शिव-धनुष तोड़ने वाला व्यक्ति सभा से अलग होकर सामने आ जाए, अन्यथा वे वहाँ उपस्थित सभी राजाओं को मार डालेंगे। उनके भयंकर क्रोध, पराक्रम और क्षत्रियों के संहार से जुड़ी घटनाओं को जानने के कारण सभी राजा भयभीत हो गए होंगे। उन्हें अपनी सुरक्षा और जीवन की चिंता सताने लगी होगी।
इसके विपरीत, कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न हुए होंगे। वे स्वयं धनुष नहीं तोड़ सके थे और राम की सफलता से ईर्ष्या करते थे। उन्हें लगा होगा कि अब परशुराम राम को दंड देंगे और उनकी अपनी असफलता का दुःख कम हो जाएगा। इस प्रकार सभा में भय, चिंता और ईर्ष्यापूर्ण प्रसन्नता जैसे अलग-अलग भाव उत्पन्न हुए होंगे।
प्रश्न 3. तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के ‘तर्क’ का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: मेरी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए श्रीराम का विनय और शांति का मार्ग अधिक उचित है। क्रोधित व्यक्ति के सामने कठोर या व्यंग्यपूर्ण भाषा का प्रयोग करने से विवाद और अधिक बढ़ सकता है। विनम्रता से बात करने पर सामने वाले व्यक्ति को अपनी गलती समझने और शांत होने का अवसर मिलता है।
लक्ष्मण के तर्क उचित और साहसपूर्ण थे, परंतु उनकी व्यंग्यात्मक भाषा से परशुराम का क्रोध और बढ़ गया। इसलिए कठिन परिस्थितियों में पहले शांति, धैर्य और विनम्रता से समाधान निकालने का प्रयास करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर दृढ़ता के साथ तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं, लेकिन भाषा मर्यादित होनी चाहिए।
प्रश्न 4. ‘हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु ।’ श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?
उत्तर: यह पंक्ति श्रीराम के धैर्य, आत्मसंयम, विवेक और भावनात्मक संतुलन को दर्शाती है। सामान्यतः मनुष्य अनुकूल परिस्थिति में अत्यधिक प्रसन्न और प्रतिकूल परिस्थिति में दुखी या क्रोधित हो जाता है। इसके विपरीत श्रीराम सुख-दुःख, हर्ष-विषाद और भय जैसी भावनाओं से प्रभावित हुए बिना शांत रहते हैं।
पूरे प्रसंग में परशुराम क्रोध का, लक्ष्मण आवेश और चुनौती का, सीता चिंता का तथा अन्य राजा भय का अनुभव करते हैं। श्रीराम ही ऐसे पात्र हैं जो हर परिस्थिति में संतुलित और मर्यादित बने रहते हैं। उनका यही गुण उन्हें अन्य पात्रों से अलग और आदर्श बनाता है।
मेरी कल्पना मेरे अनुमान
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर दीजिए-
प्रश्न 1. कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: मैं भी अन्य राजाओं की तरह सीता स्वयंवर में भाग लेने के लिए राजा जनक की सभा में उपस्थित था। मैंने शिव-धनुष उठाने का प्रयास किया, परंतु सफल नहीं हो सका। जब श्रीराम ने सहजता से धनुष उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ानी चाही, तो वह टूट गया। श्रीराम की शक्ति, विनम्रता और तेज देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुआ।
इसी बीच क्रोध से भरे हुए परशुराम सभा में आए। उनके कंधे पर फरसा था और उनका भयानक रूप देखकर सभी राजा भयभीत हो गए। हम सभी ने अपने पिता और अपना नाम बताते हुए उन्हें दंडवत प्रणाम किया। राजा जनक ने भी आदरपूर्वक उनका स्वागत किया और सीता से उन्हें प्रणाम करवाया।
परशुराम ने जब धरती पर टूटा हुआ शिव-धनुष देखा, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने राजा जनक से पूछा कि यह धनुष किसने तोड़ा है। राजा जनक ने उन्हें स्वयंवर की पूरी घटना बताई। इसके बाद परशुराम ने धनुष तोड़ने वाले को सामने आने की चुनौती दी और ऐसा न करने पर सभी राजाओं को दंड देने की धमकी दी।
उनकी चेतावनी सुनकर सभा में भय छा गया। सीता और उनकी माता भी चिंतित हो गईं। तब श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता से कहा कि धनुष तोड़ने वाला उनका ही कोई सेवक होगा और वे उन्हें आज्ञा दें। इसके विपरीत, लक्ष्मण ने परशुराम के कठोर वचनों का उत्तर व्यंग्य और तर्क से दिया। दोनों के बीच तीखा संवाद होने लगा।
श्रीराम ने बार-बार विनम्रतापूर्वक परिस्थिति को शांत करने का प्रयास किया। अंततः परशुराम ने श्रीराम के अद्भुत तेज और वास्तविक स्वरूप को पहचान लिया। उनका क्रोध शांत हो गया। उन्होंने श्रीराम की महिमा स्वीकार की और उन्हें प्रणाम करके तपस्या के लिए वन की ओर चले गए। उनके जाने के बाद पूरी सभा ने राहत की साँस ली।
प्रश्न 2. “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे?
(संकेत – सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)
उत्तर: परशुराम के प्रचंड क्रोध को देखकर राजा जनक भय और चिंता के कारण कुछ नहीं बोल पा रहे थे। यह देखकर कुछ कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न हुए होंगे। वे स्वयं शिव-धनुष नहीं उठा सके थे और राम की सफलता से ईर्ष्या करते थे। उन्हें लगा होगा कि अब राजा जनक और श्रीराम को परशुराम के क्रोध का सामना करना पड़ेगा।
यह प्रसंग मनुष्य के स्वभाव की उस नकारात्मक सच्चाई को उजागर करता है जिसमें कुछ लोग अपनी असफलता के कारण दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करते हैं और उनके संकट में पड़ने पर प्रसन्न होते हैं। ऐसे लोग दूसरों के दुःख में सहानुभूति दिखाने के बजाय उसमें अपना संतोष खोजते हैं।
विधा से संवाद
कविता का सौंदर्य
यह कविता तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस के ‘बालकांड’ का एक अंश है जहाँ शिव धनुष के टूटने से क्रोधित परशुराम के रोष भरे वाक्यों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य वचनों से देते हैं। दोनों के बीच के ये संवाद कविता में नाटकीयता उत्पन्न करते हैं। संवादों के माध्यम से ही पूरी कविता का कथात्मक विकास होता है, संवाद ही चरित्र का निर्माण करते हैं और संवादों से ही भावों में विविधता भी आती है। इस प्रकार यह कविता काव्यात्मक विधा में संवाद प्रस्तुति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। नीचे कविता के संवादों की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। उन विशेषताओं को दर्शाने वाली पंक्तियों के उदाहरण कविता से ढूँढ़कर लिखिए।
संवादों की विशेषता
उत्तर:
राम की विनम्रता:
“नाथ संभुधनु भंजनिहारा।
होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही।”
परशुराम का रौद्र रूप:
“अति रिस बोले बचन कठोरा।
कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू।
उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥”
लक्ष्मण का प्रत्युत्तर:
“बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं।
कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू।”
पौराणिक संदर्भ:
“सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा।
सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥”
नाटकीयता:
“आयसु काह कहिअ किन मोही।
सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई।
अरि करनी करि करिअ लराई॥”
भाव-पहचान एवं विश्लेषण
आपने पढ़ा कि राजा जनक की सभा में उपस्थित विभिन्न पात्रों की मनःस्थिति अलग-अलग है। नीचे दिए गए भावों/मन:स्थिति को दर्शाने वाली पंक्तियों को कविता से चिह्नित कीजिए और बताइए कि यह भाव किस पात्र से संबंधित है और उसकी इस मनःस्थिति का कारण क्या है? आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।
उत्तर:
भाव/मनःस्थिति | संबंधित पंक्ति | संबंधित पात्र | मनःस्थिति का कारण |
चिंता | “बिधि अब सँवरी बात बिगारी।” | सीता की माता सुनयना | वे सीता के विवाह और भविष्य को लेकर चिंतित थीं। |
क्रोध | “बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥” | परशुराम | अपने गुरु भगवान शिव का धनुष टूटा हुआ देखकर वे क्रोधित हो गए। |
व्यग्रता | “अरध निमेष कलप सम बीता॥” | सीता | परशुराम के क्रोध और राम की सुरक्षा की चिंता के कारण वे व्याकुल थीं। |
भय | “पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥” | सभा में उपस्थित राजा | परशुराम के भयानक रूप, क्रोध और पराक्रम के कारण सभी राजा भयभीत थे। |
संयम/विनम्रता | “नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥” | राम | वे विनम्रता और धैर्य से परशुराम का क्रोध शांत करना चाहते थे। |
ईर्ष्या/कुटिलता | “कुटिल भूप हरषे मन माहीं।” | कुटिल और पराजित राजा | वे राम की सफलता से ईर्ष्या करते थे और उन्हें संकट में देखकर प्रसन्न हो रहे थे। |
(“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।”)
परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयजनित है या विवेकपूर्ण निर्णय? संवाद की स्थिति के आधार पर विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
संदर्भ: परशुराम ने अपने गुरु भगवान शिव का धनुष टूटा हुआ देखा तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। राजा जनक द्वारा स्वयंवर की घटना बताए जाने पर उन्होंने धनुष तोड़ने वाले को सामने लाने की माँग की। उन्होंने ऐसा न करने पर पूरे राज्य को नष्ट करने की धमकी भी दी।
विश्लेषण: परशुराम के भयंकर क्रोध और धमकी के कारण राजा जनक स्वाभाविक रूप से भयभीत थे। वे जानते थे कि उस समय परशुराम किसी भी तर्क या स्पष्टीकरण को शांत मन से सुनने की स्थिति में नहीं थे। यदि राजा जनक तुरंत उत्तर देते या उनका विरोध करते, तो परिस्थिति और अधिक बिगड़ सकती थी।
उनके सामने तीन विकल्प थे—परशुराम का विरोध करना, क्षमा माँगना या उचित अवसर की प्रतीक्षा करते हुए मौन रहना। विरोध करने से संघर्ष बढ़ सकता था और बिना गलती के क्षमा माँगना अनुचित होता। इसलिए उनका मौन केवल भय का परिणाम नहीं, बल्कि विवेक और परिस्थिति की गंभीरता को समझते हुए लिया गया निर्णय भी था।
निष्कर्ष: इससे स्पष्ट होता है कि राजा जनक का मौन भयजनित होने के साथ-साथ विवेकपूर्ण भी था। उन्होंने शांत रहकर अनावश्यक संघर्ष को बढ़ने से रोकने का प्रयास किया।
काव्य पंक्ति और भाव
“रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।”
(क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?
उत्तर: इन पंक्तियों को मंच पर बोलते समय मेरे चेहरे पर प्रचंड क्रोध, चेतावनी और रोष का भाव होता। आँखें लाल, भौंहें तनी हुईं और आवाज़ ऊँची तथा कठोर होती।
(ख) आपने अनुभव किया होगा कि इस कविता में परिस्थितिवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का प्रतिनिधि बन जाता है। निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे-
परशुराम
राजा जनक
लक्ष्मण
राम
सभा में उपस्थित अन्य राजा
उत्तर:
परशुराम: प्रचंड क्रोध, रोष और अहंकार के भाव द्वारा।
राजा जनक: चिंता, भय, विवेक और शांति के भाव द्वारा।
लक्ष्मण: साहस, व्यंग्य, चुनौती और आवेश के भाव द्वारा।
राम: विनम्रता, धैर्य, मर्यादा और भावनात्मक संतुलन द्वारा।
सभा में उपस्थित अन्य राजा: सामान्य राजाओं में भय तथा कुटिल राजाओं में ईर्ष्या और दूसरे के संकट पर प्रसन्नता के भाव द्वारा।
विषयों से संवाद
प्रश्न 1. सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा, धीर और उदार चरित्र के संबंध में पता चलता है जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है? चर्चा कीजिए और लिखिए।
उत्तर: जब मुझे किसी समूह, संस्था या कक्षा का नेतृत्व करना होता है, तब मुझे विनम्रता, धैर्य, मर्यादा और उदारता का परिचय देना पड़ता है। किसी विवाद की स्थिति में दोनों पक्षों की बात शांतिपूर्वक सुनना और निष्पक्ष निर्णय लेना आवश्यक होता है।
परिवार, विद्यालय या मित्रों के बीच मतभेद होने पर भी क्रोध करने के बजाय समझदारी से समाधान निकालना चाहिए। अपनी गलती स्वीकार करना, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना और आवश्यकता पड़ने पर उनकी सहायता करना भी उदारता तथा विनम्रता के उदाहरण हैं। इन गुणों से विवाद कम होते हैं और लोगों के बीच विश्वास तथा सहयोग बढ़ता है।
प्रश्न 2. कविता में वर्णित प्रसंग सीता स्वयंवर की सभा का है। प्राचीन भारतीय समाज में वर चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। ऐसी किसी एक पौराणिक ऐतिहासिक आदि घटना/ प्रसंग का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।
उत्तर: महाभारत में द्रौपदी स्वयंवर का प्रसिद्ध प्रसंग मिलता है। राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया था। इसमें अनेक राज्यों के राजा और प्रसिद्ध योद्धा उपस्थित थे।
स्वयंवर की शर्त यह थी कि प्रतियोगी को नीचे रखे जल में प्रतिबिंब देखकर ऊपर घूमती हुई मछली की आँख पर निशाना लगाना था। अनेक वीर इस कठिन परीक्षा में असफल रहे। अर्जुन ने ब्राह्मण वेश में प्रतियोगिता में भाग लिया और अपने धनुर्विद्या-कौशल से मछली की आँख को भेद दिया। इस प्रकार स्वयंवर की शर्त पूरी करने पर द्रौपदी ने अर्जुन का वरण किया।
यह प्रसंग बताता है कि स्वयंवर में कन्या के विवाह के लिए विशेष योग्यता या वीरता की परीक्षा रखी जाती थी और सफल व्यक्ति को वर के रूप में चुना जाता था।
सृजन
प्रश्न 1. परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मन:स्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।
उत्तर:
सीता: माँ! यह अचानक क्या हो गया? सब कुछ ठीक होते-होते यह नया संकट कहाँ से आ गया?
माता सुनयना: बेटी, धैर्य रखो। परशुराम अत्यंत क्रोधित हैं, परंतु तुम्हारे पिता और गुरु विश्वामित्र अवश्य कोई उपाय निकालेंगे।
सीता: मुझे श्रीराम की चिंता हो रही है। परशुराम धनुष तोड़ने वाले को दंड देने की बात कर रहे हैं।
माता सुनयना: श्रीराम शांत, धैर्यवान और पराक्रमी हैं। वे कठिन परिस्थिति को भी समझदारी से सँभाल सकते हैं।
सीता: लक्ष्मण जी के व्यंग्यपूर्ण वचनों से कहीं परशुराम का क्रोध और अधिक न बढ़ जाए।
माता सुनयना: यही चिंता मुझे भी है। किंतु विश्वास रखो, श्रीराम अपनी विनम्रता और विवेक से इस विवाद को अवश्य शांत करेंगे।
सीता: माँ, मुझे भी श्रीराम पर पूरा विश्वास है। ईश्वर उनकी रक्षा करें और यह संकट शीघ्र समाप्त हो।
प्रश्न 2. सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए।
(संकेत – लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि)
उत्तर: शिव-धनुष टूटने और श्रीराम से विवाह निश्चित होने के बाद मैं अत्यंत प्रसन्न थी। किंतु परशुराम के क्रोधपूर्ण आगमन ने मेरी प्रसन्नता को चिंता और भय में बदल दिया। उनका भयानक रूप, कंधे पर रखा फरसा और कठोर वाणी देखकर मेरे मन में श्रीराम की सुरक्षा को लेकर अनेक आशंकाएँ उत्पन्न होने लगीं।
जब श्रीराम ने अत्यंत विनम्रता से परशुराम को उत्तर दिया, तो मुझे उनके धैर्य और मर्यादा पर गर्व हुआ। मुझे विश्वास हुआ कि वे शांतिपूर्वक इस संकट का समाधान कर लेंगे। किंतु लक्ष्मण जी के व्यंग्यपूर्ण प्रत्युत्तर सुनकर एक क्षण के लिए मुझे हँसी भी आई और उनके साहस पर गर्व भी हुआ। साथ ही यह चिंता भी हुई कि उनके तीखे वचनों से परशुराम का क्रोध और अधिक न बढ़ जाए।
मुझे अपनी माता सुनयना और पिता जनक की चिंता भी हो रही थी। मैं सोच रही थी कि मेरे विवाह के कारण उन पर इतना बड़ा संकट आ गया है। अंततः मेरा पूरा भरोसा श्रीराम के विवेक, धैर्य और पराक्रम पर था। मुझे विश्वास था कि वे अपनी विनम्रता और तेज से परशुराम का क्रोध अवश्य शांत कर देंगे।
प्रश्न 3. कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्त्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।
उत्तर: मेरा नाम सोमेश है और मैं कक्षा नौवीं का छात्र हूँ। मैं एक मेहनती, अनुशासित और जिज्ञासु विद्यार्थी हूँ। मुझे गणित और विज्ञान विषयों में विशेष रुचि है तथा मैं नियमित रूप से विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेता हूँ।
पढ़ाई के साथ-साथ मुझे बैडमिंटन खेलना, पुस्तकें पढ़ना और संगीत सुनना भी पसंद है। मैं अपने मित्रों और सहपाठियों की सहायता करने का प्रयास करता हूँ। मेरा लक्ष्य निरंतर नई चीजें सीखना और अपने ज्ञान तथा कौशल का उपयोग समाज की भलाई के लिए करना है।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए-
“देखत भृगुपति बेषु कराला।”
“बोले परसुधरहि अपमाने।।”
“सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू”
यहाँ परशुराम को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है; जैसे- भृगुपति, परसुधर और भृगुकुलकेतू। आप इस कविता में अनेक विशेषताएँ देख सकते हैं, जैसे- दोहा – चौपाई का क्रम से होना, बिना वक्ता का नाम बताए उसका कथन कह देना, मुहावरों का उपयोग करना आदि । नीचे इस कविता की कुछ विशेषताएँ और उनके एक-एक उदाहरण दिए गए हैं। एक-एक उदाहरण आप लिखिए।
विशेषता | अर्थ | उदाहरण |
अनुप्रास अलंकार | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति | अरि करनी करि करिअ लराई |
अतिशयोक्ति अलंकार | बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना | अरध निमेष कलप सम बीता |
रूपक अलंकार | रूप का आरोपण करना | पद सरोज मेले दोउ भाई |
उत्तर:
अनुप्रास अलंकार:
“सुर मुनि नाग नगर नर नारी।”
इस पंक्ति में ‘न’ वर्ण की बार-बार आवृत्ति हुई है।
अन्य उदाहरण:
“अपार मार मद मोचन।”
“बहुरि बिलोकि बिदेह।”
“आयसु काह कहिअ किन मोही।”
“सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।”
अतिशयोक्ति अलंकार:
“उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।”
इस पंक्ति में परशुराम द्वारा पूरे राज्य को उलट देने की बात बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है।
रूपक अलंकार:
“भृगुकुलकेतू।”
यहाँ परशुराम को भृगुकुल का ‘केतु’ अर्थात् ध्वज या गौरव बताया गया है। परशुराम पर सीधे ध्वज का आरोप होने के कारण यहाँ रूपक अलंकार है।
बहुभाषिकता
यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई है जो कि हिंदी भाषा का ही एक स्वरूप है और उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर बोली जाती है। कविता में ऐसे बहुत से शब्द आए हैं जो अवधी भाषा के हैं। ऐसे शब्दों को पहचान कर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए। साथ ही आपकी भाषा में इनके लिए कौन-से शब्द प्रयुक्त होते हैं, उन्हें भी लिखिए।
उत्तर:
अवधी शब्द | खड़ी बोली हिंदी रूप | बोलचाल में प्रयुक्त शब्द |
कोही | क्रोधी | गुस्सैल |
बेषु | वेश | भेस |
रिस | क्रोध | गुस्सा |
सिरु | सिर | माथा |
आयसु | आज्ञा | हुक्म |
नृप | राजा | नरेश |
महि | पृथ्वी | धरती |
मोही | मुझे | मुझको |
तोरा | तोड़ा | तोड़ दिया |
लरिकाईं | बचपन | बालपन |
माहीं | में | अंदर |
काह | क्या | किस बात की |
सुनहु | सुनो | सुनिए |
कहु | कहो | बताओ |
लोक में भाषा
नीचे कोष्ठक में कविता से कुछ शब्द चुनकर दिए गए हैं। उन शब्दों से संबंधित लोकोक्ति और उसका अर्थ लिखकर स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग कीजिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है-
उत्तर:
1. मन – मन के हारे हार है, मन के जीते जीत
अर्थ: व्यक्ति की सफलता या असफलता उसके आत्मविश्वास और मनोबल पर निर्भर करती है।
वाक्य: कठिन परीक्षा से घबराओ मत, क्योंकि मन के हारे हार है और मन के जीते जीत।
2. राम – मुँह में राम, बगल में छुरी
अर्थ: बाहर से भला बनने का दिखावा करना, लेकिन मन में बुरी भावना रखना।
वाक्य: उसकी मीठी बातों पर तुरंत विश्वास मत करना, क्योंकि उसका व्यवहार मुँह में राम, बगल में छुरी जैसा है।
3. राजा – कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली
अर्थ: दो असमान योग्यताओं या स्थितियों वाले व्यक्तियों की अनुचित तुलना करना।
वाक्य: एक अनुभवी खिलाड़ी और नए खिलाड़ी की तुलना करना उचित नहीं; कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली।
4. बात – लातों के भूत बातों से नहीं मानते
अर्थ: कुछ लोग समझाने से नहीं मानते और उनके साथ कठोर व्यवहार करना पड़ता है।
वाक्य: उसे कई बार नियम समझाया गया, फिर भी वह नहीं माना। सच है, लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
5. सिरु (सिर) – ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना
अर्थ: जब कठिन कार्य आरंभ कर दिया हो, तो उसके रास्ते में आने वाली परेशानियों से नहीं डरना चाहिए।
वाक्य: जब प्रतियोगिता में भाग लेने का निर्णय कर ही लिया है, तो कठिन अभ्यास से मत घबराओ—ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना।
गद्य-रूप
नीचे लिखी चौपाई को पढ़िए-
“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।”
इस चौपाई को हम गद्य-रूप में भी लिख सकते हैं। इसमें राम परशुराम से विनम्रतापूर्वक कहते हैं- हे नाथ! शिव- धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा। आपकी क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? राम की यह बात सुनकर क्रोधित परशुराम कहते हैं।
अब आप नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए-
“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं । कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।
सुर मुनि नाग नगर नर नारी सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।”
उत्तर: अत्यधिक भय के कारण राजा जनक कोई उत्तर नहीं दे पा रहे थे। उन्हें मौन देखकर कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे। वहीं देवता, मुनि, नाग, नगर के स्त्री-पुरुष और अन्य सभी उपस्थित लोग हृदय में भारी भय लिए हुए चिंतित हो रहे थे।
गतिविधियाँ
प्रश्न 1. यह कविता संवाद का सुंदर उदाहरण है। तालिका में दिए गए कथनों को पढ़कर बताइए कि कौन-सा कथन किसका हो सकता है। अपनी समझ से सही (✓) का चिह्न लगाइए-
उत्तर:
क. राम
ख. सीता की माता
ग. परशुराम
घ. जनक
ङ. लक्ष्मण
च. राम
छ. परशुराम
ज. लक्ष्मण
प्रश्न 2. रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। कलात्मक तकनीकों (ध्वनि, भाव, संगीत, वेशभूषा) का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: इस प्रसंग का मंचन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है—
मंच को राजा जनक की सभा के रूप में सजाया जाए।
राम, लक्ष्मण, परशुराम, राजा जनक, सीता, विश्वामित्र और अन्य राजाओं की भूमिका विद्यार्थियों को दी जाए।
परशुराम के प्रवेश के समय तेज संगीत, नगाड़े और गर्जना जैसी ध्वनियों का प्रयोग किया जाए।
परशुराम के चेहरे पर क्रोध, लक्ष्मण के चेहरे पर व्यंग्य और साहस तथा राम के चेहरे पर शांति और विनम्रता का भाव दिखाया जाए।
परशुराम को जटाधारी वेशभूषा, धनुष और फरसा दिया जाए। राम और लक्ष्मण को राजकुमारों जैसी वेशभूषा पहनाई जाए।
संवाद स्पष्ट उच्चारण और उचित हाव-भाव के साथ बोले जाएँ।
नाटक के अंत में परशुराम का क्रोध शांत होने और सभा में प्रसन्नता लौटने का दृश्य प्रस्तुत किया जाए।
इस गतिविधि को अध्यापक के मार्गदर्शन में समूह बनाकर प्रस्तुत किया जा सकता है।
प्रश्न 3. ‘कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है।’ इस विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा अथवा वाद-विवाद गतिविधि के माध्यम से अपने विचार साझा कीजिए।
परिचर्चा-
उत्तर:
अध्यापक: नीलिमा, तुम बताओ कि भय या कठिन परिस्थिति में सत्य कहना आवश्यक है या नहीं?
नीलिमा: जी, मेरे विचार से सत्य कहना आवश्यक है। यदि हम भय के कारण चुप रहेंगे, तो गलत कार्य करने वालों का साहस बढ़ेगा।
सुदेश: लेकिन यदि सत्य बोलने से हमें कोई हानि होने का डर हो, तब क्या करना चाहिए?
नीलिमा: ऐसी स्थिति में सावधानी और समझदारी आवश्यक है, लेकिन केवल डर के कारण सत्य को छिपाना उचित नहीं है।
सुदेश: इतिहास में भी सत्य और न्याय के लिए आवाज़ उठाने वालों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।
नीलिमा: बिल्कुल। महात्मा गाँधी, भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस और अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने कठिन परिस्थितियों में भी अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाई। उनके साहस के कारण ही देश स्वतंत्र हुआ।
सुदेश: इसका अर्थ है कि साहस का मतलब बिना सोचे-समझे जोखिम उठाना नहीं, बल्कि उचित बात के लिए समझदारी से खड़ा होना है।
अध्यापक: बहुत अच्छा। सत्य कहते समय भाषा मर्यादित होनी चाहिए और परिस्थिति का ध्यान भी रखना चाहिए। कठिन समय में सत्य का साथ देना व्यक्ति के चरित्र और साहस की पहचान है।
मेरी पहेली
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अब अपने समूह में मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों-
उत्तर:
समाचार
नई-नई नित बात बताता,
कहाँ क्या हुआ, सब समझाता।
हर दिन इसका नया आकार,
बतलाओ क्या? यह समाचार।
धनुष
दोनों छोरों पर बँधी है डोर,
मुड़ी हुई इसकी देह कठोर।
तीर लगाकर खींचा जाए,
लक्ष्य सामने भेदा जाए।
मन
न आँखों से यह दिखाई देता,
फिर भी भीतर हरदम रहता।
इसके जीतने से होती जीत,
हार जाए तो हार सुनिश्चित।
नाग
लंबा तन और नहीं हैं पाँव,
रेंग-रेंगकर जाता गाँव।
कुछ के भीतर होता विष,
बतलाओ मैं कौन जीव?
नगर
पक्की सड़कें, ऊँचे घर,
लोगों की भीड़ इधर-उधर।
सुविधाओं का बड़ा है घर,
बतलाओ यह कौन-सा दर?
भाषा संगम
“अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक ‘धनुष’ कै तोरा।।”
नीचे ‘धनुष’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।
कमान (हिंदी); धनुः, चापम् (संस्कृत); धणुख (पंजाबी); कमान (क्रौस) (उर्दू); कमान (कश्मीरी ) ; धनुषु, कमानु (सिंधी); धनुष्य (मराठी); धनुष, कामठु (गुजराती); धनुश (कोंकणी); धनु (नेपाली); धनुक (बांग्ला); धनु (असमिया); लिरुर् (मणिपुरी); धनुष, धनु, कार्मुक (ओड़िआ); धनुस्सु, विल्लु (तेलुगु); विल् (तमिल) ; धनुस्सु, विल्लु (मलयालम); बिल्लु, धनुष (कन्नड़)
इनके अतिरिक्त, यदि आप धनुष शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
https://shabd.education.gov.in/lexicon.jsp
उत्तर: सिरायकी भाषा में ‘धनुष’ के लिए ‘कमान’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।
सिरायकी में वाक्य:
“बहूँ गुस्से नाल कौड़े बोल बोल्या—मूरख जनक! दस, एह कमान किस तोड़ी?”
Improve Your Preparation with Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
Vedantu’s NCERT Solutions for Class 9 Hindi Ganga Chapter 9 cover all textbook questions from मेरे उत्तर मेरे तर्क, मेरी समझ मेरे विचार, मेरी कल्पना मेरे अनुमान, कविता का सौंदर्य, भाव-पहचान एवं विश्लेषण, विषयों से संवाद, सृजन, व्याकरण की बात, गतिविधियाँ and भाषा संगम. Students can understand the contrasting personalities of राम, लक्ष्मण and परशुराम and learn how dialogue, humour, anger and politeness make the poem dramatic and engaging.
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CBSE Class 9 Hindi Chapter 9 Other Study Materials
S.No | Important Links for Chapter 9 Class 9 Hindi |
1 | Class 9 Ram-Lakshman-Parshuram-Sanvaad Important Questions |
2 | Class 9 Ram-Lakshman-Parshuram-Sanvaad Revision Notes |
Chapter-Specific NCERT Solutions for Class 9 Hindi Ganga
Given below are the chapter-wise NCERT Solutions for Class 9 Hindi. Go through these chapter-wise solutions to be thoroughly familiar with the concepts.
S.No | NCERT Solutions Class 9 Chapter-wise Hindi PDF |
1 | Chapter 1 - Do Bailon Ki Katha Solutions |
2 | Chapter 2 - Kya Likhun? Solutions |
3 | Chapter 3 - Samvaadheen Solutions |
4 | Chapter 4 - Aisi Bhi Baatein Hoti Hein Solutions |
5 | Chapter 5 - Aakhri Chataan Tak Solutions |
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9 | Chapter 10 - Bharati Jay Vijaykare! Solutions |
10 | Chapter 11 - Jhansi Ki Rani Solutions |
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Additional Study Materials for Class 9 Hindi
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FAQs on NCERT Solutions for Class 9 Hindi Ganga Chapter 9 Ram-Lakshman-Parshuram Samvad (2026-27)
1. Where can I download NCERT Solutions for Class 9 Hindi Ganga Chapter 9 PDF?
Students can download the FREE PDF of NCERT Solutions for Class 9 Hindi Ganga Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद from Vedantu. The PDF provides simple and exam-ready answers for the 2026-27 academic session.
2. Who is the author of राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद?
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद is written by Goswami Tulsidas. The poem is taken from the Bal Kand of his famous epic Ramcharitmanas.
3. What is Class 9 Hindi Ganga Chapter 9 about?
Class 9 Hindi Ganga Chapter 9 presents the conversation that takes place after श्रीराम breaks Lord Shiva’s bow during Sita’s swayamvar. An angry Parashurama questions the assembly, while Rama responds politely and Lakshmana replies with courage and humour.
4. Who are the main characters in राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद?
The main characters are Shri Rama, Lakshmana and Parashurama. Other important characters include King Janaka, Sita, Sunayana, Vishwamitra and the kings present in the assembly.
5. What qualities of Shri Rama are shown in Class 9 Hindi Chapter 9?
Shri Rama displays humility, patience, dignity, emotional balance and wisdom. Even in a tense situation, he speaks respectfully and tries to calm Parashurama without creating further conflict.
6. How is Lakshmana’s character different from Shri Rama’s?
Lakshmana is courageous, outspoken and quick to challenge injustice or arrogance. Shri Rama remains calm and polite, whereas Lakshmana uses sharp logic, humour and sarcastic remarks while responding to Parashurama.
7. Why was Parashurama angry in राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद?
Parashurama became angry after seeing Lord Shiva’s bow broken. He respected Shiva as his guru and considered the breaking of the bow an insult to his faith, honour and attachment to his teacher.
8. What is the main message of Class 9 Hindi Ganga Chapter 9?
The chapter teaches that patience, humility and emotional balance are effective ways to handle anger and conflict. It also shows that courage and logical reasoning are important, but harsh words may increase tension.
9. Which poetic features are used in राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद?
The poem uses dialogue, dramatic presentation, humour, sarcasm, अनुप्रास अलंकार, अतिशयोक्ति अलंकार and रूपक अलंकार. These features make the conversation lively, engaging and effective.
10. How can Vedantu’s Class 9 Hindi Chapter 9 solutions help in exam preparation?
Vedantu’s Class 9 Hindi Chapter 9 solutions provide clear answers to MCQs, explanatory questions, character-based questions, poetic-device questions, creative-writing activities and grammar exercises. Students can use them for homework, revision and practising well-structured answers for examinations.



















